GSG Reading group session: An Experience

by Gourav

 

GSG की talk का प्रथम चरण लाजवाब था! नए जुड़े हुए सदसय के तौर पर, GSG के सदस्यों का ‘Thinking Sex’ लेख का अध्ययन व उस पर खुली चर्चा करना कुछ अलग सा, कुछ अजीब सा लगा। और मेरे हिसाब से यह ‘अजीब’ इसलिए था क्योंकि आज तक जिस समाज में हम पले-बढ़ें हैं वो हमें ऐसे खुलेपन की इजाज़त नहीं देता। इन मुद्दों पर उसने हमारी सीमाएँ निर्धारित कर दी हैं, हमारी सोच को क़ैद कर दिया है और उन सीमाओं को तोड़ने वाले को, उन परिधियों से बाहर सोचने वालों को दोषारोपित करने के लिए वह उन पर ‘बिगड़ैल’ की संज्ञा थोपता है।

परंतु एक शिक्षित व विकसित समुदाय के लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसे रूढ़िवाद को हावी ना होने दे। समाज द्वारा ‘sex’ के चारों तरफ़ जो तिलस्म रचा गया है, हमारी ज़रूरत है उसे तोड़ने की, कि जो चीज़ें, क्रियाएँ हमारे जीवन में महत्वपूर्ण हों उन पर खुली, स्वस्थ चर्चा करना आवश्यक है ताकी किसी प्रकार की भाँतियों का निर्माण ना हो।

अंत में, GSG के सदस्यों का हस तरह की चर्चाएँ आयोजित करवाना क़ाबिले तारीफ़ है व मैं उनके कार्य की सराहना करता हूँ। उनके जज़्बे को सलाम!

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